अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः। चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम।। चरण स्पर्श और नमस्कार

 

चरण स्पर्श


हमें अपने से बड़े  परिजनों , संतों , ऋषियों , माता पिता के पैर क्यों छूने चाहिए ?


सनातन धर्म या हिन्दुओं में चरण स्पर्श कलांतर से लोग आज तक चल रहा है और ये अभिवादन की एक पद्धति है जैसे अन्य में लोग अपने सर को झुकाते है (जापान में) हाँथ मिलते है (इंग्लिश देश में ) , अपने हाँथ को सर के तरफ उठा के ( इस्लाम में ) , भारतीय लोग सदियों से चरण स्पर्श और नमस्कार ये दोनों पद्धिति अपनाते आ रहे है I   


हमारे धर्म शास्त्रों में अभिवादन करने के कुछ लाभ बताये गए है जो इस श्लोक में है 

अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।

चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम।।


अर्थार्थ  जो व्यक्ति सुशील और विनम्र  होते हैं, बड़ों का अभिवादन व सम्मान करने वाले होते हैं तथा अपने बुजुर्गों की सेवा करने वाले होते हैं। उनकी आयु, विद्या, कीर्ति और बल इन चारों में वृद्धि होती है।


धार्मिक महत्व 

जब हम चरण को स्पर्श करते  है. तो  ऐसी मान्यता है कि इससे उस पूजनीय व्यक्ति की सकारात्मक ऊर्जा आशीर्वाद के रूप में हमारे शरीर में प्रवेश करती है. इससे हमारा आध्यात्मिक तथा मानसिक विकाश होता है 

वैज्ञानिक महत्व 

चुंबकीय ऊर्जा हमेशा उत्तरी ध्रुव से प्रवेश कर दक्षिणी ध्रुव की ओर प्रवाहित होकर अपना चक्र पूरा करती है. यानी शरीर में उत्तरी ध्रुव (सिर) से सकारात्मक .ऊर्जा प्रवेश कर दक्षिणी ध्रुव (पैरों) की ओर प्रवाहित होती है.दक्षिणी ध्रुव पर यह ऊर्जा असीमित मात्रा में स्थिर हो जाती है. पैरों की ओर ऊर्जा का केंद्र बन जाता है. पैरों से हाथों द्वारा इस ऊर्जा के ग्रहण करने को 'चरण स्पर्श' कहते हैं. 


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